
अंतरिक्ष अब सिर्फ वैज्ञानिक खोज नहीं रहा। चाँद से लेकर मंगल तक पहुँचने की होड़ ने इसे दुनिया की नई रणनीतिक दौड़ का केंद्र बना दिया है। इस दौड़ में अमेरिका, चीन के साथ-साथ भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
अंतरिक्ष अब सिर्फ चाँद और तारे देखने का जरिया नहीं रहा, आज यह विज्ञान, तकनीक, सुरक्षा, संचार और अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
अमेरिका जो लंबे समय से अंतरिक्ष क्षेत्र का सबसे ताकतवर खिलाड़ी है, मानव अंतरिक्ष अभियानों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत भी तेजी से अपनी अंतरिक्ष क्षमता का विस्तार कर रहा है।
NASA के जरिए वह चंद्रमा पर मानव मिशनों को आगे बढ़ा रहा है। इसके साथ ही अमेरिका की निजी कंपनियाँ भी रॉकेट लॉन्चिंग, उपग्रह और अंतरिक्ष अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
इसके साथ ही चीन पिछले कुछ वर्षों में चीन ने बहुत ही अच्छी प्रगति की है। उसका अपना स्पेस स्टेशन Tiangong (Space Station) है और अंतरिक्ष वह चंद्रमा से जुड़े अभियानों पर लगातार काम कर रहा है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर में भारत की भूमिका भी अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती है। चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारत ने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं।

अब भारत चंद्रमा से वापस नमूने लाने, भारतीय मानव अंतरिक्ष मिशन और अंतरिक्ष तकनीक को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत के लिए अंतरिक्ष केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं है। उपग्रहों के जरिए मौसम की जानकारी, संचार, कृषि, आपदा प्रबंधन और देश की सुरक्षा के लिए भी अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है।
हालांकि सवाल यह उठता है कि क्या अंतरिक्ष की नई दौड़ सिर्फ देशों के बीच प्रतिस्पर्धा तक सीमित रहेगी या फिर वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ अंतरिक्षीय सहयोग को भी बढ़ावा मिलेगा?
क्योंकि अंतरिक्ष की असली जीत सिर्फ किसी एक देश को चाँद तक पहुँचाने में नहीं, बल्कि ऐसी तकनीक विकसित करने में है जिसका फायदा पूरी दुनिया को मिले।
Source : The Indian Express














