मिट्टी से सूली तक, क्यूँ होरा आंदोलन?

मझगांय और रुंझ मध्यम सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित परिवार चिता, जल, मिट्टी और सूली सत्याग्रह कर रहे हैं। आखिर ये परियोजनाएं क्या हैं और मुआवजे का पैकेज बढ़ने के बाद भी पन्ना में विरोध क्यों जारी है? पन्ना के अजयगढ़ इलाके में इन दिनों जमीन और मुआवजे को लेकर आंदोलन चल रहा है। प्रभावित परिवार…

मझगांय और रुंझ मध्यम सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित परिवार चिता, जल, मिट्टी और सूली सत्याग्रह कर रहे हैं। आखिर ये परियोजनाएं क्या हैं और मुआवजे का पैकेज बढ़ने के बाद भी पन्ना में विरोध क्यों जारी है?

पन्ना के अजयगढ़ इलाके में इन दिनों जमीन और मुआवजे को लेकर आंदोलन चल रहा है। प्रभावित परिवार कभी पानी में उतरकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं, कभी चिता बनाकर विरोध कर रहे हैं और अब मिट्टी तथा सूली सत्याग्रह के जरिए अपनी मांगें उठा रहे हैं।

इस पूरे आंदोलन के केंद्र में मझगांय और रुंझ मध्यम सिंचाई परियोजनाएं हैं। सवाल यह है कि आखिर ये परियोजनाएं क्या हैं, लोगों की जमीन क्यों प्रभावित हो रही है और सरकार की ओर से पुनर्वास सहायता बढ़ाकर ₹12.5 लाख किए जाने के बाद भी विरोध क्यों जारी है?

मझगांय और रुंझ परियोजनाएं क्या हैं?

मझगांय और रुंझ मध्य प्रदेश की मध्यम सिंचाई परियोजनाओं में शामिल हैं। इनका मूल उद्देश्य क्षेत्र में पानी की उपलब्धता बढ़ाना और खेती के लिए सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना है।

सिंचाई परियोजना में बांध या जलाशय बनाया जाता है ताकि बारिश के पानी को जमा करके जरूरत के समय खेतों तक पहुंचाया जा सके। इससे कृषि क्षेत्र को पानी मिलने और खेती की उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद होती है। लेकिन जलाशय बनाने के लिए जिस क्षेत्र में पानी जमा होगा, वहां की जमीन प्रभावित हो सकती है।

इस परियोजना के दो पक्ष हैं:

  • एक तरफ परियोजना से भविष्य में किसानों को सिंचाई का लाभ मिल सकता है।
  • दूसरी तरफ जिन परिवारों की जमीन परियोजना के कारण जाती है, उनके लिए यही विकास विस्थापन का कारण बन जाता है।

कितने परिवार प्रभावित हैं?

मझगांय और रुंझ परियोजनाओं से कई गांवों के परिवार प्रभावित हो रहे हैं। इनमें किसान और आदिवासी परिवार शामिल हैं, जिनकी जमीन या मकान परियोजना के डूब क्षेत्र में आ रहे हैं।

हाल की रिपोर्टों के अनुसार, मझगांय परियोजना से करीब 1,450 परिवार प्रभावित हैं। वहीं रुंझ परियोजना में प्रभावित परिवारों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। प्रशासनिक रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों में इनकी संख्या अलग-अलग बताई गई है।

प्रभावित परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल केवल जमीन का मुआवजा नहीं, बल्कि पुनर्वास और विस्थापन के बाद आजीविका का भी है। जमीन जाने के बाद परिवारों को रहने की जगह के साथ खेती या आय का नया साधन भी तलाशना पड़ सकता है।

इसी वजह से आंदोलन में मुआवजे के साथ-साथ पुनर्वास, भुगतान की प्रक्रिया और प्रभावित परिवारों की पात्रता जैसे मुद्दे भी उठाए जा रहे हैं।

विवाद शुरू कहां से हुआ?

परियोजना के लिए जमीन प्रभावित होने के बाद सरकार की ओर से मुआवजे और पुनर्वास की व्यवस्था की गई। शुरुआत में प्रभावित परिवारों के लिए ₹5 लाख प्रति परिवार की एकमुश्त पुनर्वास सहायता का प्रावधान था।

लेकिन आंदोलनकारियों का कहना था कि यह राशि पर्याप्त नहीं है। उनका तर्क था कि जमीन और घर खोने के बाद केवल ₹5 लाख से परिवार को दूसरी जगह बसाना और अपनी आजीविका दोबारा शुरू करना मुश्किल होगा।

इसलिए प्रभावित परिवार अधिक पुनर्वास राशि और अपनी दूसरी मांगों को लेकर लगातार विरोध करते रहे।

सरकार के द्वारा उठाए गए कदम

प्रभावित परिवारों की मांग के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने दोनों परियोजनाओं के लिए पुनर्वास पैकेज बढ़ाने का फैसला किया। सरकार ने पहले से मिलने वाली ₹5 लाख की सहायता के ऊपर ₹7.5 लाख अतिरिक्त देने की मंजूरी दी।

इस तरह पात्र परिवारों के लिए पुनर्वास सहायता बढ़कर ₹12.5 लाख प्रति परिवार हो गई।

रुंझ परियोजना के लिए अतिरिक्त सहायता की राशि करीब ₹54.75 करोड़ और मझगांय परियोजना के लिए करीब ₹108.75 करोड़ बताई जा रही है।

बारिश के बाद विरोध और तेज क्यों हुआ?

सितंबर में भारी बारिश के बाद परियोजना क्षेत्र में पानी बढ़ने की खबरों ने प्रभावित परिवारों की चिंता बढ़ा दी।

वनहरीकला टपरिया में लोगों ने पानी के बीच चिता आंदोलन किया। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि बढ़ते पानी से उनके खेत और घर प्रभावित हो रहे हैं और मुआवजा तथा पुनर्वास की समस्याएं अभी पूरी तरह हल नहीं हुई हैं।

इसके बाद आंदोलन के तरीके लगातार बदलते गए। पहले चिता सत्याग्रह, फिर जल सत्याग्रह, उसके बाद मिट्टी सत्याग्रह और सितंबर के चौथे सप्ताह में सूली सत्याग्रह शुरू किया गया।

अनोखे आंदोलन के तरीके क्यों?

जल सत्याग्रह

पानी में खड़े होकर प्रदर्शन करना इस बात का प्रतीक है कि परियोजना से प्रभावित लोगों की जमीन और घर पानी में जाने का खतरा झेल रहे हैं।

मिट्टी सत्याग्रह

अपने शरीर पर मिट्टी लगाकर प्रदर्शनकारी अपनी जमीन के साथ अपने पुराने संबंध को दिखाते हैं।

किसान के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होती। उसी जमीन से खेती होती है और परिवार की आय चलती है।

इसलिए जमीन जाने का मतलब केवल एक संपत्ति खोना नहीं है। आजीविका का एक बड़ा हिस्सा भी खत्म हो सकता है।

चिता सत्याग्रह

चिता के जरिए प्रदर्शनकारी विस्थापन को अपने जीवन और भविष्य के लिए गंभीर संकट के रूप में दिखा रहे हैं।

पन्ना में चल रहा आंदोलन सिर्फ इस बात की लड़ाई नहीं है कि परिवारों को ₹5 लाख मिलेंगे या ₹12.5 लाख।

यह उस बड़े सवाल की लड़ाई है कि विस्थापन के बाद किसी परिवार की जिंदगी कैसे चलेगी?

जमीन का बाजार मूल्य तय किया जा सकता है। घर की कीमत लगाई जा सकती है। लेकिन जमीन से जुड़े वर्षों पुराने रिश्ते, खेती से मिलने वाली आजीविका और गांव के सामाजिक संबंधों की कीमत लगाना आसान नहीं है।

यही वजह है कि पन्ना में चिता से शुरू हुआ विरोध मिट्टी और सूली सत्याग्रह तक पहुंच गया है। अब सरकार के सामने सिर्फ मुआवजा बांटने की चुनौती नहीं है। चुनौती यह भरोसा देने की भी है कि जिस परिवार की जमीन परियोजना के लिए ली जा रही है, उसका भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

Sources: Navbharat Times, ThePrint Hindi

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